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‘आईना जिंदगी का’ पुस्तक की समीक्षा

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समीक्षक : आर्चाय पुष्पदंत जी महाराज
‘आईना जिंदगी का ’ कवयित्री की अनुभूतियों की अच्छी अभिव्यक्ति है। इसमें कवयित्री ने अपनी जिंदगी के हर पल को जिया है । कहीं उसने अपनी बचपन की यादों को शब्दों की माला में पिरो दिया है । कहीं जवानी के खूबसूरत पलों को कविता का रूप दे दिया है और कुछ कविताओं में उसने जिंदगी के यथार्थ को दिखाया है । ‘आईना जिंदगी का’ में जिंदगी की सच्चाई झांकती नजर आती है। इसलिए इसका शीर्षक बिल्कुल सार्थक है ।
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यूपीए और एनडीए के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है तृतीय ध्रुव

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राजेंद्र शर्मा
तीसरा मोर्चा नाम से पुकारा जाए या किसी और नाम से, उड़ीसा में वैकल्पित मोर्चा मैदान में हैं । एक ऐसा मोर्चा जो एक साथ कांग्रेस और भाजपा का विकल्प पेश करना चाहता है । उड़ीसा के इस मोर्चें का गठन तीसरे मोर्चें के रूपक की एक और विशेषता प्रदर्शित करता है । इसका नेतृत्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से कुछ ही दिन पहले अलग हुए बीजू जनता दल के हाथ में है । इसमें जहां वामपंथी पार्टियां हे, वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी हैं, जो कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए का महत्वपूर्ण घटक रही है और कम से कम चुनाव तक रहेगी ।
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सत्ता के लालच में बदलते रहे ‘‘नारे’’

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लेखक - डॉ० मन्नू यादव
लोकतंत्र जनता के द्वारा, जनता से, जनता के लिए, का नारा अब्राह्म लिंकन, की देन
है जो अमेरिका में क्रान्ति का सूत्रपात कर गया था। गरीब लकड़हारे का बेटा स्वयं
लकड़ियाँ जला कर, पढ़ने के बाद किसान के खेत में काम करके किताबों का मूल्य
अदा करने वाले जिस शख्स ने यह नारा दिया उसे अमल में लाया और संघर्षों के
सहारे जिस बुनियाद को रखा था आज उस इमारत के बुर्ज पर बाराक ओबामा जैसा
शख्स अमेरिकन लोकतंत्र पर प्रथम अश्वेत ‘मुखिया’ बन कर अब्राहम लिंकन के सपनों
को साकार किया।
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हर सफल पुरूष के पीछे होती है महिला

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नई दिल्ली, (एजेंसी): बिल क्लिंटन के पहली बार राष्ट्रपति बनने के समय एक चुटकुला बेहद लोकप्रिय हुआ था कि हिलरी और बिल कहीं जै रहे थे। हिलेरी रास्ते में एक गैराज के सामने रूकीं और गैराज मालिक की ओर देखकर बिल क्लिंटन से कहा कि यह कभी मुझ पर मरता था।
इस पर क्लिंटन ने मजाक में कहा कि ‘बेचारा गरीब’ इस पर हिलेरी ने कहा, हां,यह वास्तव में बेचारा है।
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कलमचियों के हाथों में जूते क्यों? एक पड़ताल

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स्वस्तिका
२००८ का दिसम्बर। अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियाँ जोरों पर थी। तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्लु बुश अपने आखिरी दिनों में बचा खुचा काम पूरा कर रहे थे। इसी में शामिल था इराक का दौरा। वही इराक जिसके स्वेच्छाचारी फासीवादी शासक सद्दाम हुसैन से उन्होंने देश को आजाद कराया था।
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