समीक्षक : आर्चाय पुष्पदंत जी महाराज
‘आईना जिंदगी का ’ कवयित्री की अनुभूतियों की अच्छी अभिव्यक्ति है। इसमें कवयित्री ने अपनी जिंदगी के हर पल को जिया है । कहीं उसने अपनी बचपन की यादों को शब्दों की माला में पिरो दिया है । कहीं जवानी के खूबसूरत पलों को कविता का रूप दे दिया है और कुछ कविताओं में उसने जिंदगी के यथार्थ को दिखाया है । ‘आईना जिंदगी का’ में जिंदगी की सच्चाई झांकती नजर आती है। इसलिए इसका शीर्षक बिल्कुल सार्थक है ।



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